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ମରୁଭୂମିର ମରୀଚିକା

(୧) ବେଳାଭୂମିରୁ ଦୂର ଦିଗବଳୟରେ ଦିଶୁଥିବା ଆକାଶ ଆଉ ସାଗରର ଏକାକାରର ଦୃଶ୍ୟରେ ଦୂରତା ଠିକ ଯେତିକି ତୁମ ଆଉ ମୋ ଭିତରେ ଦୂରତା ଠିକ ସେତିକି। (୨) ଏକାପରି ଶୁଭୁଥିବା ଗେଟୱେ ଅଫ ଇଣ୍ଡିଆ ଏବଂ ଇଣ୍ଡିଆ ଗେଟ ଭିତରେ ସମାନତା ଠିକ ଯେତିକି ତୁମ ଆଉ ମୋ ଭିତରେ ସମାନତା ଠିକ ସେତିକି। (୩) ଗାଧୁଆ ତୁଠର ଅଳତା ହଳଦୀ ବୋଳା ପଥର ଏବଂ ରୋଷେଇ ଘରେ ଲଙ୍କା ହଳଦୀ ଆଦିର ବେସର ପ୍ରସ୍ତୁତ... Continue Reading →

ମୁଠାଏ ଅତୀତ

ମୁଠାଏ ଅତୀତ ମୁଠାଏ ଅତୀତକୁ ନିଜ ଉପରକୁ ଫିଙ୍ଗି ଦେଖିଲି କିଛି ଲୋମ ଟାଙ୍କୁରିଉଠିବାର ସ୍ପର୍ଶ ଦେଇ ଗଲେ ତ କିଛି ଗୋଧୂଳିର ପ୍ରଥମ ବର୍ଷାର ବାସ୍ନା ପରି ମହକ। ଏଇତ ଜୀବନ, କିଛି ହସ କିଛି ଲୁହ ର ଖତିୟାନ। ମୁଠାଏ ଅତୀତକୁ ପୁରୁଣା ଡାଏରୀ ରୁ ପଢି ବସିଲି ପୃଷ୍ଠା ପରେ ପୃଷ୍ଠା ଲେଉଟାଇଗଲି କିଛି ରାଗ କିଛି ଅଭିମାନ ର ସମୁଚୟ। ଠିକ ସମୁଦ୍ରର ସେଇ ଜୁଆର ଆଉ ଭଟ୍ଟା ପରି। ମୁଠାଏ... Continue Reading →

From an Anganwadi cook to Lok Sabha MP to getting trolled in Gossip: the Unbecoming of a Society

କହିଲା ଜାତିର କାନେ କାନେ, ଉଠିବୁ ଆଉ ତୁ କେତେ ଦିନେ,ପୂରୁବ ଗୌରବ ପୂରୁବ ମହିମା, ପଡୁ ନାହିଁ କିରେ ତୋର ମନେ ।ରଚନା - ଉତ୍କଳ ଗୌରବ ମଧୁସୁଦନ ଦାସ The sacred land of Jagannath, the state of Odisha, is well known for its rich cultural heritage, its religious importance, and its contribution to build a modern-day India. Since the era of... Continue Reading →

घर – भूख – आँसू

सरहद पार सिपाही धुप में चाहे कितने बार पानी पिला लिए हो,पर अपने बन्दूक के गोली में उसीका ही नाम लिखी होती है!कहने केलिए चार दीवार तो मेरे हॉस्टल रूम में भी है,चार दीवार उस रेस्तोरां में भी है जहाँ हम हर रोज खाने जाते है!पेट भरने केलिए, सुस्त रहने केलिए, खा तो लेते है... Continue Reading →

ମୋତେ ମୁଁ ହୋଇ ରହିବାକୁ ଦିଅ

ମୁଁ ମନ ଖୁସି ରେ ହଲିଝୁଲି ଚାଲୁଥିଲି, ତୁମେ କହିଲ. ମୁଁ କାଳେ ପିଇବା ଶିଖିଲିଣି || ମୁଁ ଯେବେ ରାସ୍ତାରେ ସିଧା ଚାଲିବା ଆରମ୍ଭ କଲି, ତୁମେ କହିଲ, ପିଇ ଚାଲିବାର ଅଭ୍ୟାସ ହେଇଗଲାଣି || ଆମର ଯେବେ ଦେଖା ହେଲା, ମୁଁ ବ୍ୟସ୍ତ ଥିଲି, ତମେ କହିଲ, ତୁ ବଡ ଲୋକ ହେଇଗଲୁଣି || ହେଲା କି, ମୁଁ ତୁମ ମନ କଥା ବୁଝିଲିନି, ତମେ ବି ତ ଚେଷ୍ଟା କଲନି...|| ତମେ ଦେଖିବାକୁ... Continue Reading →

आज में खामोश हूँ

इस नातेदारी का मैं क्या नाम दूँ?वो जो मैं चाहता हूँ या फिर वो जो तुम चाहते हो?वो जो सबके सामने है या फिर वो जो सिर्फ आपने सामने है?या फिर वो जो दुनिया चाहती है? बहरहाल... तुझे पाके खोने की छोटी सी सफर में हम इस तरह खो गए की,भीड़ भरी इश्क़ की बाजार... Continue Reading →

सारा शहर सो गया है, शायद तुम भी

सारा शहर सो गया है, शायद तुम भी।नींद आँखों के इंतजार में है,परऑंखें इधर उधर तुझे ढूंढ़ रही है।आँखों का कोई कसूर नहीं,यह दिल, जो तेरी नज़रों का मुंतज़िर है।

अधूरी

शायद ही किसी ने सुदी को तितली बनते हुए देखा हो,पर हमने देखे हैं,भँवर को फूल की प्रीत और गरिमा को भंग करते हुए, पर हौंसला नहीं हारे हमने,जिंदा रहने के लिए अफ़वाह समझकर गले लगा लिए,और जरूरी भी था। तेरी वो न बिछड़ने की वादा झूठी थी और ख्वाहिशें अधूरी,शायद!! मैंने ही पहचान न पाया... Continue Reading →

बुलंदशहर

फ़ासले का एहसास तब हुआ जब, चाटुकारिता और पत्रकारिता पर्यायवाची बन गयी । फ़ासले का एहसास तब भी हुआ जब, झूठी मानव भावनाएं किसी की जीने की आजादी छीन ली । फ़ासले का एहसास तब भी हुआ जब, एक पत्नी की आँसू पति के मातम पर बह नहीं पायी, कुछ कह नहीं पायी । जो... Continue Reading →

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